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Essay on Mahapurush Srimanta Sankardeva in Hindi.



शंकरदेव 



भूमिका 


महापुरुष शंकरदेव का जन्म सन् १४४९ (1449) ई. में नगांव जिले के बरदोवॉ ‌नामक स्थान में हुआ था।  उनके पिता का नाम कुसुंबर भुइयां और माता का नाम सत्यसंधॉ था । 




शिक्षा 


अध्ययन में उनका स्थान अद्वितीय था । उनकी स्मरण शक्ति एवं मेधा शक्ति इतनी तीव्र थी कि माधव कंडली के यहां पढ़ाई आरंभ करने के कुछ दिनों बाद ही उनकी गणना विद्वानों में होने लगी । उन्होंने संस्कृत के हर एक विभाग में प्रकाण्डता प्राप्त कर ली । 




विवाह 


23 वर्ष की आयु में विवाह कर शंकरदेव ने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया । विवाह के बाद उनके यहां एक लड़की पैदा हुई, जिसका नाम मनु था । बड़ी होने पर उनकी शादी उन्होंने हरी नामक व्यक्ति से कर दी । इसी समय शंकरदेव की पत्नी का स्वर्गवास हो गया । 




तीर्थाटन 


पत्नी की मृत्यु के पश्चात उनके जीवन में विरक्ति आ गई । स्वभाव से धार्मिक और विचारशील होने के कारण उनमें गृह त्याग की इच्छा जागी और 24 वर्ष की उम्र में उन्होंने भारत के बहुत से स्थानों का भ्रमण किया । 


इन स्थानों में गया , पूरी , वृंदावन , मथुरा काशी , द्वारिका , प्रयाग , सेतुबंध रामेश्वर , बारहकुंड , कुरुक्षेत्र ,अयोध्या , बद्रिकाश्रम आदि है । 12 वर्ष की लंबी तीर्थ यात्रा में शंकरदेव ने अनेक लोगों से भेंट की , जिसमें विद्वान और धर्मशास्त्री भी थे ।



समाज सेवा 


यात्रा से लौटने पर उन्होंने फिर से विवाह किया । फिर गीता भागवत के आख्यानों एवं " एकशरण" धर्म की शिक्षा देना आरंभ किया । 


शंकरदेव ने असमीया समाज में फैले अनाचार और धर्म के प्रति ग्लानी को देखकर उसे दूर किया । 


उन्होंने ग्राम - ग्राम  में नमघरो के माध्यम से समाज में एक परिवर्तन ला दिया , जिसमें जाती - पाति के  भेदभाव का कोई स्थान नहीं रहा । उन्होंने भागवत का असमीया रूपांतर तथा अन्य शास्त्रों का अनुवाद भी किया । "कीर्तन पुथी"  उनका प्रसिद्ध ग्रंथ है । 



इसके अलावा उन्होंने गीत, पत्र - भावना , बरगीत आदि की रसनाए की । इस प्रकार बैष्णव धर्म के प्रभाव से उन्होंने समाज में फैले अनाचार को दूर  कर दिया । 


माधवदेव उनके प्रधान शिष्य हुए ।



मृत्यु 


सन 1569 ई. में 120 बर्ष की अवस्था में शंकरदेव का स्वर्गवास हो गया । 


शंकरदेव एवं उनके उपदेशों के प्रति जनता की निष्ठा आज भी है और भविष्य में भी रहेंगी ।



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